,,,,,,,,,,,धर्मराज,,,

हा बहुत दिनों के बाद,, एक बार फिर अगला पत्र लिखकर लाया हूँ,

आज की बात कर रहा हु, सोचा आप आएंगे लेकिन आये नही, एक साथ रहकर बैठकर बातें करेंगे।

लगता है आप हम सबसे दूर होते जा रहे है, आप अपनों से दूर होते जा रहे हो, आपको सबसे ज्यादा तकलीफ है, लेकिन दूर भागने से दूर नही होगी,

आपको सामने आकर बोलना पड़ेगा, जो भी लड़ना भी पड़ेगा, दुनिया के सामने आकर अपनी बात रखनी होगी।

आपने पहले ही अपने परिवार, समाज, देश के बारे में सोचकर, अपने सपनो को छोड़ा है, तोडा है, खुद का नुकसान वहुत किया है।

साफ शब्दों में कहु तो आपने अपनी बहुत सारी जरूरी जरूरतों को मर जाने दिया है, वो भी खुद की आँखों के सामने,

मेरे धर्मराज आप मेरे बहुत खास हो लेकिन जो भी आपके सबसे ज्यादा खास या यह कहु की जो आपको सबसे ज्यादा चाहते है,उनका किया होगा, किया देना चाहते है उनको आप।

बस मैं यही कहना चाहता हु की आप सिर्फ खुद के भाव में, खुद की भलाई के बारे में ही सोचें।थोड़े समय के लिए।

फिर देखो दुनिया आपके पीछे चलकर आएगी, यही दुनिया का दास्तुर है। हां आज भी आपके चाहने वाले बहुत है, जनता के बीच, लेकिन में चाहता हु की आप इस चालक दुनिया के सम्राटों के बीच खुद को पहली पंक्ति में खड़ा करो

आप सोचते होंगे की जब सुरुआत की तब सुयोधन बहुत बड़ी बात करता था, आज किया हुआ डरी सी आवाज, पहले इतना नम्र तुझे मेने नही देखा,, और

तेरा गुस्सा जो तेरी पहचान और तेरी कमजोरी दोनों है।आखिर किया बात है, सुयोधन आप ऐसा ही सोचेंगे लेकिन ऐसी कोई बात नही है बस एक कसक बाकि है।।

फिर आप भी सुनो मेरी एक ख्वाहिश , या कहो मेरी कसक, इच्छा, मन की आत्मा की आवाज आप राज सम्राट हो जाओ।।

आपका दुर्योधन।

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,,,,,,,,मेरी मौत की कसम। ।।।

माँ आज मेरी मौत की कसम,

माँ आज तेरी कोख की कसम।

में काहू तू बांज बन जा,

महाकाली का रूप धारण कर भवानी बन जा।

नर जाती का कर दे नाश,

मैं तो कहती हूं कर भगवन का भी नाश।

खुले कर दे केश,

धारण कर रणचंडी का वेश

प्रथम माताओं का नाश कर,

नारियों के डर का आज विनाश कर।

माँ आज मैरी मौत की कसम

माँ एक जनम और दे,

रणचंडी का अवतार दे,

महाकाली का विकराल रूप दे,

नर जाती का विनाश करने दे।

माँ आज मेरी मौत की कसम

खुद के आँसू खुद पोछना चाहती हु,

माँ गंगा बनकर गंगा की धारा बदलना चाहती हु।

मै खुद अवतार चाहती हु,

इतिहास बदलना चाहती हूँ।

नर जाती का विनाश चाहती हु,

माँ महाकाली का अवतार चाहती हूँ।

माँ आज मैरी मौत की कसम,

माँ आज तेरी कोख की कसम।।

,,, मेंशर्म से झुक चूका हूँ, मरना चाहता हु,

बेटी ट्विंकल के नाम यह कविता,

हर बेटी को समर्पित करता हु यह कविता। ।

,,,,,,,माँ की याद आयी है।।

आज फिर छोटा बच्चा होना चाहता हु।

माँ की गोद में सिर रखकर सोना चाहता हु।।

दूर आये है माँ से, माँ की आँखों के सामने रहना चाहता हु।

माँ से दूर रहने का दर्द हमसे ज्यादा कोन जाने।

जो माँ के पास है वो हमारा दुःख किया जाने।।

ये दूरिया जीवन का हिस्सा है।

पापी पेट के लिये माँ से बिछड़ना।

यही तो हमारे दुःख का किस्सा है।।

वो किया जाने जो माँ से अभी दूर न आये।

निराशा में हमारा हौशला कोन बढ़ाये।

इस भीड़ की तन्हाई में।।

मुझे माँ की याद आयी हैं।

आज सपने में माँ की फटकार खायी है।

आज माँ की याद आयी है।।

रात का सोना हो , खाना खाना हो,

कपड़े धोने हो,या सुबह की नींद हो।

सब में माँ याद आयी है।।

आज फिर माँ अपने लादले को

सुलाने आयी है।

आज माँ की याद आयी है।।

,,,,,,,,,धर्मराज,,।।।

आज बात मेरी ,, धर्मराज की,, मेने अपने आप को बदलने की कोशिश की है, मुश्किल बहुत हुई ,, लेकिन आदतों में सुधार किया है।

अब में लोंगो से कम मिलता जुलता हु। कोई जरूरी काम हो तो ही मिलता हु। कही नही जाता हूं कोई के कहे तो ही मदद के लियें जाता हूं, नही तो अपना काम करता हु।

ऐसा लगता है कि आप भी मुझसे बात नही करते है,जैसे में कोई आपका दुश्मन हु।या फिर पराया हु, मुझे समझ नही आ रहा है।

अब में अकेलापन महसूस करता हु लगता है कि कुछ नही है, मेरी जिन्दगी में सिर्फ खालीपन।

और सच में कुछ नही है मेरे पास, शायद सबके लिए ऐसा समय आता होगा।

जो चाहिये था वो हासिल न कर सका,,, परिवार के लिए खुद के सपने खुद ही मार दिये है।उसकी सजा मुझे मिल भी चुकी है।लेकिन अब थक सुखा हु।

आप भी कम से कम दिन के एक बार तो मुझसे बात कर सकते हो, ताकि मेरा दर्द कम हो सके।।अब बदल रहा हु।

आपको मुझे राजा बनने की इच्छा शक्ति का स्वागत करता हु, सबको इच्छा होती है, मेरी भी इच्छा है,

लेकिन बाकी जो नियति को मंजूर हो होगा।

,,,,,,,धर्मराज।।

धर्मराज,, तुम्हारी हर बात सुनी अच्छी लगी और बुरी भी।

अच्छी बातों पर अमल कर रहा हु और साथ में अपने जीवन में काम ले रहा हु।

लेकिन मेरी नियत में कोई बदलाव नही आ सकता मेरे प्रिय भ्राता सुयोधन,, एक बात और जब तक दुनिया को दुर्योधन और सुयोधन के नाम का मालूम नही है ,,जब मालूम होगा तो गर्व से लेंगे।

मुझे मालूम है राजतंत्र में साम ,दाम, दण्ड, भेद सब की जरूरत पड़ती हैं

मुझे बस सेवा करनी हैं, सब की सेवा चाहे में सम्राट बनु या न बन पाऊ मुझे कोई फर्क नही पड़ता है।हां मुझे सबके सामने कोई भी बात रखने में तकलीफ नही होती हैं।

अब डर सा महसूस होता है सबसे डर लगने लगा है।ऐसा लग रहा है जिसकी मेने सेवा की या फिर मदद की उनसे ज्यादा।। शायद सत्य बोलने की सजा हो।

अब बात आपकी मेरे प्रिय भ्राता, आपको सुयोधन काहू या कुछ ओर खुद को समझ नही आ रहा है।

अबतक में अगर सत्य बोल रहा हु तो आपने कुछ भी नही किया। मेरे लिये तो छोड़ो किसी के लीये भी नही काम नही किया। एक बार आप खुद ही सोच के देख लेना। शायद आप मेरी बातों से सहमत हो या न हो लेकिन यही परम सत्य है।

इससे ज्यादा तो आपको मेने और परिवार वालो ने कितनी बार आपको मुसीबत से बचाया है।ऐसा लगता है आपका और मुसीबत जा सदियों से रिश्ता है। शायद आप उससे निकलने की कोशिश करते रहेंगे ,या फिर कितनी बार आप निकले भी होंगे।फिर भी साथ नही छोड़ती है।

मुझे मालूम है कि आप अपनी तकलीफे हमें नही बताते है यही आपकी सबसे बड़ी गलती है।अपने इस गलती से कुछ सीखा होगा और सुधार करने की कोशिश भी की होगी।आपके दोस्त तो बहुत है लेकिन आप अपने दिल की बात सबको नही बताते है।

मुझे मालूम है की आपकी सोच बहुत बड़ी है, और आप औरो से जुदा हो। यह में नही सब जानते है।आप कम बोलते है, लेकिन जब भी बोल देतो हो एक ज्वारभाटा सा उठता है।आपके दिमाग में किया चल रहा होता है, कोई भी नही बता सकता।

कभी कभी तो डर भी लगता है आपसे , हम सब को विशेष कर औरों को कब क्या कर दो।कई लोग आपको बेवफुफ् भी बोलते हैं, आखिर में आप क्या बनोंगे वो आप ही जानो, आपका भविष्य जाने लेकिन आप आज शून्य है।

आपकी सम्राट वाली रहन सहन जिन्दगी से आपको दुनिया राजा बनने को बोलती होगी और सबको पसंद करते है विशेषकर आपके मित्र गण जो आपके साथ रहते है।

आप सिर्फ अपने क्रोध को काबू करना सीखो।आपका सबसे बड़ा दुश्मन यही है।आपको गलत सही का पेता होता है फिर भी अपने स्वभिमान के लिए लड़ लेते हों।और अपना नुकसान कर देते हो।

आप भी थोड़ा बदलने की कोशिश कीजिये, मुझे मालूम है कि यह आपके लिए बहुत ही मुश्किल है फिर भी आपको बोल रहा हु।रही मेरी बात में आपको अगले पते बता पाउँगा की ।मुझे मेरे बारे में आपसे पहले लिखना था, लेकिन दिल नही मान रहा था।इसलिये पहले आपके बारे में लिख दिया, जल्द ही में खुद के बारे में लिख दूँगा।मेरे प्रिय सुयोधन( दुर्योधन) आपका भ्राता धर्मराज ।।

,,,,,,,,बेटीया,,,,

कभी हां कभी ना ,

किया है मेरी माँ ( माँ बेटी से)

सिर्फ मेरे पास मोबाइल है माँ ( बेटी माँ से)

फिर इतना शोर क्यों। (माँ)

समाज है मेरी माँ( बेटी)

मेरा ,हमारा , अपना समाज ।।

मेरी माँ कैसे समझाऊ, समझ नही आता।

दुःख का दरिया काहू , या काहू उसे मेरी व्यथा।।

माँ ये मेरी माँ कुछ भी समझ नही आता।

बैरी काहू या उसको कोई अपना

ही सगा भाई, भ्राता।।

आंख छिपाऊँ या, दरिया में अपने आंसू बहा ऊ।।

ऐ माँ अपना दर्द कैसे छिपाऊँ।।

ऐ मेरी बेटी मेरी सुन।

अब मेरी व्यथा सुन।।

,,,,,,,,,,, माँ की जुबानी अगले पेज में,,।